2025 के आखिरी सप्ताह में देश भर में हिंसा और क्रूरतापूर्ण घटनाओं की बाढ़ देखी गई। आज शांति चाहने वाले देश भक्त और लोकतांत्रिक नागरिकों के मन में यह सवाल उठ रहा है किन घटनाओं के स्रोत कहां हैं। इसकी जड़ें कितनी गहरी और कहां तक फैली हुई हैं।
अचानक क्रिसमस के पवित्र दिन के आस-पास घटी घटनाओं को लेकर अनेक तरह के प्रश्न खड़े हो रहे हैं। क्या यह एक सुचिंतित डिजाइन है कि सामाजिक वैचारिक संगठनात्मक और राजनीतिक केंद्र कहां है। जहां से इस तरह के कार्यवाहियों को अंजाम देने की प्रेरणा और ऊर्जा मिलती है। वह फैक्टरी कहां है। जिसमें ऐसे नफ़रती जॉम्बी तैयार किये जाते हैं। इस वर्ष 25 दिसंबर के आस पास साम्प्रदायिक बर्बरता के अखिल भारतीय विस्तार को देखते हुए सभी तरह के अमन पसंद नागरिक चिंतित और सशंकित हो गए।
अचानक दो-तीन दिनों में असम से लेकर उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश महाराष्ट्र कर्नाटक और केरल तक ईसाइयों पर 80 से ज्यादा हमले हुए। जहां भिन्न -भिन्न हिंदुत्ववादी गिरोहों द्वारा नग्न तांडव मचाया गया। जिसकी जद में हमारे देश की सभ्य शालीन सुशिक्षित शांतिप्रिय माइनॉरिटी ईसाई खिंच आये। चर्च मॉल दुकान रेस्टोरेंट जैसे स्थानों पर ईसाइयों पर हमले किए गए। ऐसा लगता है कि यह सोची समझी योजना ईसाई समाज के हाशियाकरण के साथ उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के लक्ष्य से प्रेरित लि थी। क्योंकि ईसाई समुदाय छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन को कॉरपोरेट के हाथ से बचाने लिए चल रहे प्रतिरोध संघर्ष का अभिन्न अंग हैं।
पिछले कुछ वर्षों से धर्मांतरण के नाम पर ईसाई ननों पादरियों को निशाना बनाया गया। चर्चों अस्पतालों और सेवा कार्यों के उद्देश्य पर धर्मांतरण के आरोप लगे। जगह-जगह स्वयंभू धर्म रक्षक संगठन जैसे विहिप बजरंग दल हिंदू युवा वाहिनी जैसे गिरोह सोची समझी रणनीति के तहत अल्पसंख्यक समाज के धार्मिक त्यौहारों के आसपास सक्रिय हो जाते हैं। धार्मिक स्थलों या उन जगहों पर जहां ईसाई (मुसलमान भी) इकट्ठा होते है, वहां पहुंच कर जय ‘श्री राम या जय बजरंगबली ‘का डरा देने वाला नारा देते हुए तोड़फोड़ करते हैं। इस वर्ष पास इलाकों में स्थित चर्चों के सामने बजरंग दल के बैनर तले ठीक क्रिसमस के दिन हनुमान चालीसा का पाठ होने लगा। जिन लोगों ने ऐसे नारे सुना है।
वह स्पष्ट रुप से समझ सकते हैं कि इसमें रत्ती भर भी धार्मिक आस्था नहीं है।बल्कि एक डरावना आक्रोश और दूसरे धर्म के लोगों को अपमानित भयभीत करते हुए अपनी पहचान बुलंद करने का भाव ज्यादा होता है।पुलिस और प्रशासन पर दबाव डाल कर पीड़ित के खिलाफ एफआईआर कराई जाती है। जेल भेजा जाता है। भीड़ उन्हें अपमानित करती है। चर्चों मस्जिदों या शांता क्लॉज जैसे प्रतीकों तोड़ा जाता है। पुलिस प्रशासन का झुकाव स्पष्ट तौर पर तथाकथित हिंदू गिरोहों के पक्ष में दिखाई देता है।
बीते वर्ष 25 दिसंबर के इर्द-गिर्द अन्य अल्पसंख्यकों पर भी हमले हुए। कई जगहों पर प्रवासी मुस्लिम मजदूरों की मॉब लिंचिंग (उड़ीसा) हुई। सबसे आधुनिक और विकसित कहे जाने वाले दिल्ली एनसीआर के प्रतिष्ठित शहर गाजियाबाद में पुलिस इंस्पेक्टर ने बिहार के मुस्लिम मजदूरों को बांग्लादेशी कह कर अपमानित किया। डराने धमकाने की कोशिश की और उनकी नागरिकता की पहचान के लिए नायाब तरीका ढूंढ लिया। प्रथम दृष्ट्या एक सुचिंतित और सोची समझी तथा खास तरह की मुस्लिम विरोधी मानसिकता की अभिव्यक्ति थी, जो उप्र की राज्य मशीनरी में सक्रिय मुस्लिम विरोधी वायरस की भयावहता को उजागर करता है। यह घटनाक्रम संस्थाओं की निष्पक्षता तटस्थता और पेशेवर दक्षता के खत्म हो जाने की घोषणा है।
यह सच है कि इस सर्वग्रासी नफरत का विस्तार सिर्फ पिछले 11 वर्षों में ही नहीं हुआ। इसके पीछे कम से कम एक शताब्दी से चल रहा बहुआयामी प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है। जिसे गुलाम भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के साथ-साथ तत्कालीन रियासतों के राजाओं महाराजाओं का सहयोग और संरक्षण प्राप्त था। इसलिए हम देखते हैं कि हिंदू सांप्रदायिक संगठनों (मुस्लिम सांप्रदायिकता का भी यही चरित्र था) ने अपने संरक्षकों की ईमानदारी पूर्वक सेवा की। यही सेवाभाव और वफादारी इनके विध्वंसक कार्रवाइयों के दौरान इनका सुरक्षा कवच है।
इसलिए इनका चरित्र निर्धारण हम औपनिवेशिक सामंती गठजोड़ वाले दलाल और प्रतिगामी संगठन के बतौर कर सकते हैं। उपनिवेश कालीन शासकों के प्रति जो प्रेम भक्ति भाव उस समय था। वही 1947 के बाद साम्राज्यवादी सरगना अमेरिका और इसराइल गठजोड़ तथा भारत में सामंती और सरमायेदारी निजाम के प्रति बना हुआ है। जो बड़े कॉरपोरेट घरानों और कुछ मित्र पूंजीपतियों के प्रति वफादारी और सेवा में स्पष्ट दिखाई देता है। यही इनका मूल वर्ग चरित्र है।
इसलिए आधुनिक सांप्रदायिकता का धर्म से कोई संबंध नहीं है। इन तत्वों के जीवन व्यवहार में धार्मिक मूल्यों और नैतिकता के लिए दूर तक कोई जगह नहीं है।यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक डिजाइन है ।जिसके तहत समाज और राष्ट्र- राज्य को ढालने का प्रयास है।विश्व साम्राज्यवादी पूंजी के वर्चस्व के दौर में मजहबी राजनीति भारत जैसे देश में दलाल नौकरशाह पूंजीवाद और सामंती राज्य का सबसे सुचिंतित रणनीतिक उपकरण है। जो मेहनतकश वर्ग के विभाजन और अन्यीकरण के साथ उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन और संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण द्वारा दलाल पूंजी के शासन को स्थायित्व देता है।
सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा मध्यकालीन परिघटना नहीं है। यह सर्वथा आधुनिक युग यानी पूंजीवादी सभ्यता की देन है। मध्यकालीन युग में इसके लक्षण नहीं मिलते। इसलिए आधुनिक धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणतंत्र के चरित्र को बदलकर वित्तीय पूंजी के युग के सबसे क्रूर और मध्ययुगीन परंपराओं विचारों पर आधारित फासीवादी राष्ट्र राज्य के निर्माण और स्थायित्व के औजार के बतौर धर्म का इस्तेमाल होता है। जिससे पूंजी के अमानवीय लूट की पर्दादारी की जा सके।भारत में सांप्रदायिकता के दो स्रोत है। एक- वर्ण आधारित जाति व्यवस्था।
दूसरा- साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी के गठजोड़ से बना अर्ध सामंती अर्थ औपनिवेशिक राज्य ढांचा।
जाति एक सोपानवत सामाजिक ढांचा है। जिसे क्रूर सामाजिक विधानों परंपराओं द्वारा संचालित और शास्त्रों व स्मृतियों में सूत्रबद्ध नियमों द्वारा वैधानिक मान्यता प्राप्त है। पूर्णतया गैर बराबरी पर आधारित है और इस गैर बराबरी को ईश्वरीय कृपा प्राप्त है। इसके ऊपरी पायदान में श्रेष्ठतम मनुष्य रहते हैं और सबसे निचली पायदान पर समाजिक उत्पादन में लगा लेकिन स्वतंत्रता बराबरी और बंधुत्व के निषेध पर टिक इंसान है। जिसका अस्तित्व अपने से उच्च वर्ण के लोगों की दासता और सेवा पर निर्भर है।
इसलिए समाज का बहुलांश राजनीतिक आर्थिक सामाजिक बराबरी के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। इसकी विशेषता यह है कि प्रत्येक सोपान पर स्थित समाज अपने से निचले सोपान वाले से खुद को श्रेष्ठ मानता है और उसके प्रति वैसा ही भाव रखता है। आज के दौर में यह विभाजन ही कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ का सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है।
हमारे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अकेला ऐसा संगठन है। जो वर्ण-व्यवस्था को सामाजिक संतुलन को बनाए रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था घोषित करता है। और इसे दैवीय और शाश्वत सामाजिक व्यवस्था मानता है। इसलिए इसमें किसी भी तरह के सुधार या परिवर्तन का विरोधी है। (प्रत्यक्षता उतना ठोस रूप में नहीं) सभी तरह के सामाजिक सुधारों से घृणा करता है।
सामाजिक सुधारकों का चरित्र हनन करते हुए समय-समय पर अपमानित करने का प्रयास करता रहा है। संघ के चिंतन व व्यवहार का मार्गदर्शक ग्रंथ मनुस्मृति ही है और उसके द्वारा प्रतिपादित विधानों को सर्वश्रेष्ठ सामाजिक नियमन का विधान घोषित करता रहा है इसलिए 1949 में संविधान की जगह मनुस्मृति को लागू करने की वकालत की थी। यह कहते हुए कि इसमें कुछ भी भारतीय या सनातन नहीं है।
इसलिए आज के भाजपा और संघ परिभाषित संचालित हिंदुत्व वादी संगठनों में विभाजनकारी सामाजिक चेतना स्थाई भाव है। जिससे उनके सभी क्रियाकलाप निर्देशित होते हैं। मनुष्य जब सैद्धांतिक व्यवहारिक और वैचारिक रूप से समाज के किसी हिस्से को विजातीय या अपने से अलग या नीच स्वीकार कर लेता है तो उसके स्वतंत्रता समानता बंधुत्व के भाव गायब हो जाते हैं और व्यवहार में यह विभाजन निर्णायक भूमिका निभाने लगता है।
इसलिए सामंती नौकरशाही दलाल पूंजीवादी राष्ट्र राज्य के ढांचे में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के क्रम में यह विभाजन ही बेसिक हथियार बन जाता है। इसलिए लोकतांत्रिक तौर तरीकों की जगह नफरत क्रूरता और हिंसा सफलता के हथियार बन जाती हैं। यही कारण है कि लोकतंत्र विरोधी स्वभावत: वर्ण-व्यवस्था समर्थक हो जाते हैं। राजनीतिक संगठनों अन्य समूहों के प्रति नफरत घृणा और हिंसा यह कोई क्षणिक विचलन या तात्कालिक कार्यनीति नहीं होती है। बल्कि उनका स्थाई चरित्र और व्यवहार है। इसलिए आप देखिएगा की पिछले 100 वर्षों में आरएसएस की कार्यवाहियों में एक निरंतरता दिखाई देती है। यह निरंतर उनकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का स्थाई तत्व है।
दूसरा वर्ण आधारित समाज में बराबरी और बंधुत्व के लिए कोई जगह नहीं होती। इसलिए तथाकथित हिन्दू धर्म में विभिन्न जातियों में आपसी संबंधों में एक निश्चित दूरी का होना अनिवार्य है। एक जाति से दूसरी में आगमन निषिद्ध है। अगर ऐसा होने लगे यह सामाजिक ढांचा स्वत: ढह जाएगा। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक नियमन की सोशल इंजीनियरिंग अवधारणा में समानता आज़ादी और बंधुत्व के लिए जगह नहीं है।
वह वर्ण समाज के समस्त नैतिक और सामाजिक मूल्यों की रक्षा करते हुए उसे आज के भौतिक ज़रूरतों के अनुरूप ढालने के लिए समरसता समन्वय सहयोग स़ंसर्ग जैसे पदों व विचारों का प्रयोग करता है। यही कारण है कि जातियों के बीच में मौजूद विभाजित चेतना को और प्रदूषित करते हुए उन्हें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करता है। तथा जाति चेतना को वित्तीय पूंजी के हितों के अधीन ला देता है। जिससे वर्तमान लोकत्रांतिक ढांचा और उसकी संस्थाए अपनी लोकतांत्रिकता को बैठती है। लुटेरे कॉरपोरेट पूंजी पिछड़े सामंती सामाजिक मूल्यों और वर्ण व जाति आधारित समाज विकास योजनाओं के साथ प्रवेश करती और घुल मिलकर जाती हैं।
दलाल वित्तीय पूंजी बढ़ जाते और हिंदुत्व के साथ मिलकर खास तरह का जटिल राजनीतिक तंत्र विकसित कर लेती हैं। जिसमें लोकतंत्र अपनी प्रासंगिकता को बैठता है और राजनीतिक नेतृत्व कॉरपोरेट ताकतों के दास बन जाता है। (संदर्भ के लिए अंबानी के लड़के की शादी में शामिल राजनीतिक शक्तियों को आप देख सकते हैं)। जो सत्ता सीढ़ी चढ़ने की अनिवार्यता को व्यक्त करता है।
वर्तमान राष्ट्र राज्य का जन्म औद्योगिक क्रांति के पेंट से हुआ। जो विकास क्रम में धर्म व सामंती मूल्यों और नैतिकता से मुक्त होकर स्वतंत्रता समानता बंधुत्व के बुनियादी आधार पर संगठित हुआ। जहां राज्य पूर्णतया धर्म लिंग वर्ण नल और भारत में जाति निरपेक्ष संगठन होना था। इस बुनियादी अवधारणा के विपरीत संघ ने धर्म को को राज्य का आवश्यक कम्पोनेंट बना दिया और धर्म राज्य का अवधारणा पेश की।
अपनी समस्त आधुनिक चेतन के बावजूद माफी नामा लिखकर जेल से बाहर आने के बाद सावरकर ने दो राष्ट्र का सिद्धांत देकर सामाजिक चेतना में विभाजन का स्थाई तत्व प्रवेश करा दिया। स्वयं सावरकर हिंदुत्व को हिंदू धर्म का पर्यायवाची नहीं मानते। वे इसे सर्वथा नई राजनीतिक श्रेणी करार देते हैं। उनके अनुसार हिंदू और मुसलमान अलग-अलग राष्ट्र है। इसलिए भारतीय महाद्वीप में दो राष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर राष्ट्र राज्य का निर्माण होना चाहिए। यह मुस्लिम कट्टरपंथियों के लिए संजीवनी थी। जिससे आगे चलकर भारतीय उपमहाद्वीप मैं दो देशों का निर्माण हुआ। हिंदुस्तान यानी इंडिया और पाकिस्तान।
हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की संघर्ष की बुनियादी शर्त थी कि हम इस विभाजन कारी विचार पर विजय पाया जाए। औपनिवेशिक गुलामी और विभाजन कारी चिंतन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन आधुनिक विचारों और अस्त्रों और शस्त्रों से लैस होकर आगे बढ़ रहा था। लेकिन ये ताकतें इस स्तर पर विकसित नहीं हो पाई। जिस कारण से भारत को इस महाद्वीप को एक नहीं रखा जा सका और इस विभाजन कारी विचार को पराजित नहीं किया जा सका। यहां भारत के स्वतंत्रता आंदोलन या भारत विभाजन पर के बारे में कुछ लिखने की लिखने का समय नहीं है।
लेकिन दो राष्ट्र के सिद्धांत ने भारत में स्थाई घृणा और हिंसा के तत्व को तार्किक आधार दे दिया। जिसकी बलि अब तक लाखों लोग चढ़ चुके हैं। आज भारत फिर उन पुरानी जहालत भरी स्थितियों में तथा विश्व साम्राज्यवाद के सामने आत्मसमर्पण करने की स्थिति में पहुंच गया है।
विश्व साम्राज्यवादी पूंजी का चरित्र अमानवीय घृणित क्रूर अनैतिक व पतनशील किस हद तक हो गया है। इसे समझने के लिए हमें इतिहास में जाने की ज़रूरत नहीं है। फिलिस्तीनियों का नरसंहार और एप्सटाइन परिघटना ने पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया के साम के आदमखोर चरित्र नंगा कर दिया है। वित्तीय पूंजी ने अब तक कितने अपराध किए और षड्यंत्र रचे हैं। इसका इतिहास में कहीं कोई मिसाल नहीं मिलती। नस्लों कबीलाई समूहों जन छातियों एथनिक समूहों संस्कृतियों भाषाओं के साथ पर्यावरण और इकोसिस्टम का विनाश किया है। जिससे मानव अस्तित्व के लिए संकट खड़ा हो गया है।
पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था से नाभिनाल बद्ध भारतीय राज्य पूंजी की लूट की सुरक्षा के लिए अपने नागरिकोंके खिलाफ लिए कोई भी अपराध और पाप करने के हद तक सकता है । पूंजीवादी साम्राज्यवादी राज्य व्यवस्था की मूल प्रवृत्ति 2014 के बाद भारत में क्रूरतम रूप से दिखाई देने लगी है। राज्य लोकतांत्रिक और विधिक सीमाओं को रौंदते हुए जनता की सम्पत्ति और जीवन बुलडोज कर रहा है। उसे इंसानों का क्रंदन और चीख सुनाई नहीं दे रही।
वहीं राज्य प्रायोजित हिंसक गिरोह अपने ही देश के नागरिकों के खिलाफ बराबर अपराध और हिंसा को अंजाम दे रहे हैं। इस खून आग और हिंसा को बहुसंख्यक समाज के जागरण और सशक्तिकरण के लिए वैध आवश्यक करार दिया जा रहा है। इसे हिंदू राष्ट्र और हिंदू समाज के जागरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जिससे कारपोरेट पूंजी की लूट और कॉर्पोरेट हवस को संतुष्ट किया जा सके। आज हम मंत्रियों मुख्यमंत्रियों के हिंसक नफरती और सांप्रदायिक विध्वंसक भाषा और कार्यवाहियों को इसी अर्थ में देख सकते हैं।
इसलिए क्रिसमस के इर्द-गिर्द हुई हिंसा को हमें कुछ लंपट गिरोहों की अलग-थलग कार्रवाई के बतौर नहीं देखना होगा। इसे पिछले एक शताब्दी के संघ गिरोह के संगठित प्रयास के बतौर देखना होगा। जब भारतीय राज्य धीरे-धीरे हिन्दुत्व फासीवादी राज्य में तब्दील होने लगा था। स्वतंत्रता संघर्ष से निकले मूल्यों से पल्ला झाड़ते हुए राज्य लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और नागरिक की संवैधानिक जिम्मेदारी से अपने को मुक्त कर लिया है।
कॉरपोरेट पूंजी के गिरफ़्त में फंसा हुआ भारतीय राज्य भारत के महा विभाजन पर ही जिंदा रहना चाहता है। यही कारण है कि वह जलते मणिपुर सुलगते आदिवासी इलाकों में फैलते असंतोष को सकारात्मक दृष्टि से हल ढूंढ़ने की जगह उसके साथ शत्रुतापूर्ण ढंग से संकट को संबोधित कर रहा है। संघ नीति शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों के समावेशन की जगह उनके अलगाव को बढ़ाने मे लगा है। इस प्रक्रिया में भारतीय राज्य की लोकतांत्रिक चेतना कमजोर हो रही है और संवैधानिक व्यवस्था ढहने की कगार पहुंच गई है।
जिससे साम्राज्यवादी हस्तक्षेप बढ़ रहा है और देश चौतरफा आर्थिक सामाजिक राजनीतिक संकट में उलझा गया है। आश्चर्य यहै की वर्तमान संकट को लोकतांत्रिक संवैधानिक ढांचे में हल करने की जगह भारतीय शासक वर्ग से फासीवादी समाधान पेश कर रहै।
इसलिए वर्तमान हिंदुत्व के लंपट गिरोहों और नफरती संस्थाओं की जड़ें भारतीय वर्ण व्यवस्था में अंदर तक धंसी हुई हैं और वहां से पोषण तत्व ग्रहण करती हैं।वहीं इसके टैक्टिकल वित्तीय पूंजी के लूट के विस्तारित कारोबार तक जाते है। और साम्राज्यवादी पूंजी के सूक्ष्म ढांचे के तहत संरक्षित और सुरक्षित हैं। आज पूंजीवाद मानव सभ्यता के समक्ष खड़े संकट के समाधान ढूंढने की स्थिति में नहीं है। वह मरणासन्न अवस्था में पहुंच गया है। इसलिए मानव सभ्यता के लिए अभिशाप बन चुका है। जरूरत है पूंजीवाद के विकल्प निर्माण की जिससे भारतीय समाज का लोकतंत्रीकरण करते हुए मानवीय बनाया जा सके।
(जयप्रकाश नारायण वामपंथी कार्यकर्ता और किसान नेता हैं।)